Sunday, January 10, 2021

महर्षि दयानन्द को विष प्रदान।

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#महर्षि_दयानन्द_को_विष_प्रदान_एवम्_उनका_जगत्_से_दिव्य_प्रयाण - सम्पूर्ण विवरण

उल्लेखनीय है कि कुछ द्वेषभाव से ग्रसित लोग, बिना ऋषि दयानंद की किसी प्रामाणिक जीवनी का आधार लिए, यह दुष्प्रचार कर रहे हैं कि स्वामी दयानंद की मृत्यु विष देने से नहीं हुई, परंतु उनके द्वारा कोई स्वयं ली गई औषधि ही उन पर दुष्प्रभाव कर गई। इस प्रकार के मिथ्या प्रचार का और कोई कारण नहीं, केवल यही है कि स्वामी दयानन्द ने लोगों की मूर्तिपूजा छुड़वा कर उन्हें योगाभ्यास की तरफ प्रवृत्त किया कि जिससे वह अपने भीतर ईश्वरानन्द की उपलब्धि कर सकें। अत्यन्त शोक है कि महर्षि के इस परम उपकार का बदला वह महर्षि के प्रति दुष्प्रचार करके पूर्ण कर रहे हैं। दिन-रात द्वेषाग्नि में जलने वाले यह लोग, क्या कभी शांति से सो पाते होंगे? परमात्मा ऐसे लोगों को सद्बुद्धि दें और इनके हृदयों में असत्याचरण के लिए दण्डभय उत्पन्न करे।

महर्षि दयानंद की जीवनी लिखने में अनेक वर्षों तक कठोर परिश्रम करने वालों में पंडित लेखराम, स्वामी सत्यानंद, पंडित देवेंद्रनाथ मुखोपाध्याय और श्री लक्ष्मणजी आर्योपदेशक का नाम प्रमुख है। इन सभी ने ऋषि दयानन्द की मृत्यु का कारण विष देना ही बताया है। श्री लक्ष्मण जी ने बृहद् जीवनी के साथ एक लघु पुस्तक भी लिखी "महर्षि दयानंद के प्रेरक प्रसंग" जिसका संपादन श्री राजेंद्र जिज्ञासु द्वारा किया गया। इसी पुस्तक से और स्वामी जगदीश्वरानंद कृत "देवर्षि दयानन्द चरित" से कुछ अंशों को सम्मिलित करके महर्षि के जीवन के अंतिम समय का वृतांत निम्नलिखित है, जो नास्तिकों को भी आस्तिक बना देता है और उनके अनुयायियों को अपार सहनशक्ति की दिव्य प्रेरणा देता है -

#ऋषि_का_जोधपुर_आगमन_और_नन्ही_भक्तन_नामक_वेश्या_का_प्रभावः- श्री स्वामी जी महाराज को महाराजा यशवन्त सिंह द्वारा बहुत श्रद्धा से जोधपुर में आमन्त्रित किया गया। उस समय स्वामी जी शाहपुरा में थे। निमंत्रण स्वीकार करके जब स्वामी जी जोधपुर पहुंचे, तो महाराजा ने सम्मानपूर्वक उनका स्वागत किया और उनके निवास एवं भोजन की सुव्यवस्था कर दी। साथ ही उनको लोगों के हितार्थ अपने उपदेशामृत की वर्षा करने के लिए प्रार्थना की। अतः वहां पहुंचने के दूसरे ही दिन, बिना किसी लाग-लपेट के निर्भय होकर ऋषि दयानन्द, महाराजा के बंगले के विशाल आंगन में उपदेशों द्वारा जनसमूह के समक्ष, सत्य का मण्डन तथा असत्य का खण्डन करते रहे। कुछ दिनों पश्चात् उनको पता चला कि महाराजा ने नन्ही भक्तन नाम की एक वेश्या रखी हुई है, और राज्य की नीति का निर्धारण उसके परामर्श से ही होता है। (राजस्थान में भक्तन जाति की कन्यायें वेश्या ही होती थी। उर्दू में वेश्याओं के नाम के साथ "जान" शब्द लगता है। अतः पंडित लेखराम द्वारा उर्दू में लिखी जीवनी में "नन्ही जान" भी छपा मिलता है।)

एक दिन अपने निश्चित नियम के अनुसार स्वामी जी दरबार में पहुँचे। उस समय महाराजा यशवन्त सिंह के पास नन्हीजान आई हुई थी। स्वामी जी के आने का समय जानकर महाराजा उसे डोली में रवाना कर रहे थे। डोली उठने के पूर्व ही स्वामी जी को समीप आता देखकर, महाराजा घबरा गये और पालकी जो एक ओर झुकी, तो महाराजा ने अपना कंधा अथवा हाथ लगवाया। देशस्थ राजाओं की यह अवस्था देखकर उस सच्चे देश हितैषी के हृदय पर गहरी चोट लगी। वेश्या-प्रेम के घोर घृणित कुव्यसन का, वे वैसे ही कड़ा खण्डन किया करते थे। सैकड़ों पुरुषों का उन्होंने इस पाप-पंक और दुर्व्यसन की दलदल में से उद्धार किया था। अतः आपने महाराजा को स्पष्ट कह दिया कि राजपुरुष सिंह सदृश है तथा वेश्या कुत्तिया के समान है। सिंहों के लिये उनका संसर्ग कदापि उचित नहीं है। इन वेश्याओं पर आसक्त मन कुत्तों सरीखा ही कार्य करता है। यह भले मनुष्यों का चलन नहीं है। यह आर्य जाति की कुल मर्यादा के विपरीत है। इस कुव्यसन के कारण धर्म-कर्म भ्रष्ट हो जाता है।

इतने पर ही बस नहीं, आपने महाराजा के भाई सर प्रताप सिंह को पत्र लिखा कि मुझे बहुत शोक है कि आप और बाबा साहेब दोनों रोगयुक्त शरीर वाले हैं। सोलह लाख लोगों की रक्षा और कल्याण का भार आप लोगों पर है। सुधार और बिगाड़ भी आप लोगों पर निर्भर है, फिर भी आप अपने स्वास्थ्य की रक्षा तथा आयु बढ़ाने के कार्य पर बहुत कम ध्यान देते हैं, प्राचीन भारतीय राजा शूरवीर और जितेन्द्रिय होते थे।

इन सब बातों का परिणाम यह निकला कि महाराजा को इस वेश्या से कुछ-कुछ घृणा आरम्भ हुई, परन्तु जब नन्हीजान को इसका पता लगा, तो वह बदला लेने के लिये तुल गई। दूध जैसे सर्प के भीतर जाकर विष बनता है, वैसे ही स्वामी जी का कथन संकीर्ण लोगों के हृदय में बहुत बड़े अत्याचार का बीज बना। नन्हीजान व्याख्यान के बारे में सुनकर जल भुन गई, फिर जब महाराजा को अपने से कुछ घृणा करता हुआ पाया, तो लगी कहने कि स्वामी जी ने मेरे ऊपर बहुत अत्याचार किया है। जैसे भी हो प्रतिशोध लेना चाहिये।

#वेश्याओं_के_लम्बे_हाथः- वेश्याओं के व्यापक सम्बन्ध इस अंधकार के युग में सारा जग जानता है। और यह वेश्या भी ऐसी जिसने महाराजा को वश में कर रखा था। उसने अपने सारे रोब और प्रभाव का पूरा-पूरा प्रयोग किया। महाराजा तो अनपढ़ ब्राह्मणों से घृणा करते थे, परन्तु यह वेश्या ब्राह्मणों को बहुत मानती थी। यह घोर मूर्तिपूजक थी। मेहता विजयसिंह चक्रांकित मत के खण्डन से बहुत रुष्ट थे। जोधपुर में स्वामी जी के इस्लाम मत पर खण्डन के कारण भैय्या फैजुल्ला खाँ घोर विरोधी बन गया था। मूर्तिपूजा और मृतक श्राद्ध के खण्डन से यहांँ के ब्राह्मण और पुजारी पहले ही अपनी आजीविका की हानि समझ रहे थे। वह यह भी जानते थे कि ऋषि दयानंद को शास्त्रार्थ में हराना असंभव है। अतः उन्हें भी नन्ही भक्तन की सहानुभूति का आधार मिल गया। अंग्रेजों की वक्र-दृष्टि तो ऋषि दयानन्द के स्वराज्य के समस्त क्रियाकलापों पर थी ही। बस फिर क्या था, कठपुतली बन गये और जो नाच नचाया गया नाचते गये। ऋषि के प्राण-हरण की सांँठ-गांँठ होने लगी। कई प्रकार से महर्षि को कष्ट दिये गये।

#मिली_भगत_से_सब_कुछ_हुआ:- पहले तो जिस कहार पर स्वामी जी को बड़ा प्रेम और विश्वास था और जो अत्यन्त प्रीति से सेवा किया करता था, वह छह सात सौ रुपये का माल लेकर भाग गया। जो ब्रह्मचारी द्वार पर सोता था, उसे उस रात्रि वहाँ सोने ही न दिया। प्रात:काल ही चोरी होने का शोर मच गया। महाराजा ने आदेश दिया कि जैसे भी सम्भव हो, उस कहार को जहाँ से भी हो खोज कर लाया जावे। वह स्वयं जोधपुर राज्य के कठिन मार्ग और घाटियों से सर्वथा अपरिचित था, फिर भी वह आश्चर्य का विषय है कि वह वहीं कहीं गुम हो गया। उसका कुछ भी अता पता न चला।

#राज्य_कर्मचारी_हँसी_उड़ाते_थे:- इसी प्रकार इस षड्यन्त्रकारी जत्थे की कृपा से पहरे वाले तथा दारोगा आदि हृदय से विरोध करते रहते थे। स्वामी जी तर्जना करते तो यह लोग कर जोड़कर उनके सामने तो कुछ आज्ञा दे देते - कुछ कह देते और पीठ पीछे मिलकर ये सब हँसते थे, अतः स्वामी जी का इन सब पर से विश्वास उठ गया था। जिन लोगों पर चोरी का सन्देह था, उनके बारे में बड़े अधिकारियों द्वारा जानकारी तो ती गई, परन्तु जेल में किसी को न डाला गया।

#जोधपुर_के_कर्मचारियों_पर_से_विश्वास_उठ_गयाः- ऐसे सब कारणों से राज्य के व्यक्तियों पर स्वामी जी का विश्वास जाता रहा और वे इस नगर से प्रस्थान करने का विचार करने लगे। परंतु तब तक बहुत देर हो गई थी, षड्यंत्र को अंतिम रूप देने के लिए काली रात निकट आ चुकी थी।

#स्वामी_जी_को_प्राणघातक_विष_प्रदानः- यह आश्विन कृष्णपक्ष, चतुर्दशी संवत् १९४० (२९ सितम्बर १८८३) की रात्रि की घटना है। सबने गुप्त मन्त्रणा कर स्वामी जी के पाचक के द्वारा दूध में कालकूट संखिया नामक विष मिलाकर उन्हें पिलवा दिया। (पंडित लेखराम कृत जीवनी के अनुसार उस पाचक का नाम "धौड़मिश्र" था, जो शाहपुरा का निवासी था। वही देवेंद्रनाथ कृत जीवनी में वर्णन है कि "कालिया नामक व्यक्ति ने एक माली से मिलकर नन्ही भक्तन के प्रोत्साहन से दूध में विष मिलाकर स्वामी जी को पिलाया। इस कालिया का नाम ही "जगन्नाथ" कहा जाता है।" महर्षि की एक अन्य जीवनी - "नवजागरण के पुरोधा" के लेखक डॉक्टर भवानीलाल भारतीय के अनुसार संखिया के साथ कुछ पिसा हुआ कांच भी दूध में मिलाया गया था।)

#कालकूट_विष_का_भयंकर_प्रभावः- महर्षि दुग्धपान करके थोड़ी ही देर सो पाये थे कि उदर-वेदना की खलबली ने उन्हें जगा दिया। उसी व्याकुलता में उन्होंने तीन बार वमन किया। स्वयं ही जलादि लेकर कुल्ले करते रहे, पास सोये सेवकों को जगाकर कष्ट नहीं दिया। कुछ विश्राम कर सो गये और प्रात: बहुत देर से उठे। उठते ही फिर उल्टी हुई। इस वमन से उन्हें कुछ सन्देह हुआ, अत: कुछ जलपान करके दूसरी उल्टी उन्होंने स्वयं कर डाली। वे अपने कर्मचारियों से कहने लगे - "आज हमारा जी उल्टा आता है। शीघ्र अग्निकुण्ड में धूप डाल, सुगन्धि कर कोठी से दुर्गन्धि निकाल दो।" तदानुसार ऐसा ही किया गया। इसके पश्चात् पेट में शूल चला, तो आपने अजवाइन आदि का काढ़ा बनवाकर पिया, जिससे अतिसार की छेड़छाड़ हो गई, परन्तु शूल को चैन न पड़ा। तब डॉ० सूरजमल जी को बुलवाया गया, जिन्होंने वमन बन्द करने की औषधि दी और जब स्वामी जी ने कहा कि अत्यन्त शूल हो रहा है, तथा प्यास भी लगी है, तब डॉक्टर साहब ने प्यास बन्द होने की औषधि दी और कहा कि इस रोग का कारण यही है कि इस भयानक देश के जोधपुर नगर में ऐसे महात्मा का निवास न हुआ होता, तो यह शूल काहे को जमता।

#असह्य_कष्टों_में_कैसे_शान्त_सहनशील_रहे:- इसी प्रकार शूल बढ़ता गया। शरीर के सब अंगों में प्रविष्ट हुआ। श्वास के साथ बड़े वेग से चलता था, परन्तु ऐसे दुःख में भी स्वामी जी महाराज ने ईश्वर के ध्यान के उपरान्त कभी हाय तक नहीं की। सायं समय महाराजा को सूचना मिली। उन्होंने तुरन्त डॉ० अलीमर्दान खाँ को चिकित्सा के लिये भिजवाया, परन्तु इस डॉक्टर का सारा इलाज ही उलटा पड़ता गया और 
रोग ने महाभयंकर रूप धारण कर लिया। एक दिन में तीस-चालीस दस्त होने लगे। शूल ज्यों-का-त्यों बना रहा। मुख, सिर और माथा छालों से भर गया, हिचकी बँध गई और शरीर कृश होने लगा। यह डॉक्टर महाशय स्वामी जी को चौगुनी मात्रा में दवा देते था। विरेचक औषधियों के अतिरिक्त वह इंजेक्शन द्वारा भी स्वामी जी के शरीर में विष प्रक्षेप करता रहा। महाराज के उदर में ऐसा तीव्र, ऐसा विषम और ऐसा भीषण शूल उठता था कि यदि कोई दूसरा मनुष्य होता तो छटपटा कर प्राणान्त को पहुँच जाता। वे धैर्य से असह्य दारुण वेदना सहन कर रहे थे। 'आह' तक न करते थे।

दिन प्रतिदिन स्वामी जी के कष्टों में वृद्धि होती गई। निर्बलता अत्यधिक हो गई। करवट बदलना, उठना दो चार व्यक्तियों की सहायता के बिना कठिन हो गई। हिचकियों के आधिक्य और उदर शूल ने शक्ति को और भी क्षीण कर दिया, परन्तु धन्य थे स्वामी जी महाराज जो सब कष्टों को अत्यन्त शान्ति और धीरज से सहन कर रहे थे। हिचकी बहुत सताती, तो दो-दो घंटा के पश्चात् प्राणायाम से उसका निवारण करते, तो लोग बहुत आश्चर्य करते थे कि वह शरीर जो पूर्ण ब्रह्मचर्य से, पूरे संयम और सावधानी से गढ़ गढ़कर बना था, किस प्रकार इसका नाश किया जा रहा था। हाँ, स्वामी जी ने महाराजा प्रताप सिंह को स्पष्ट कह दिया था कि विष दिया गया था। उपचार उलटा किया गया।

इन सब घटनाक्रम के अतिरिक्त स्वामी सत्यानंद कृत "श्रीमद्दयानंद प्रकाश" जीवनी में विषदाता पाचक जगन्नाथ को क्षमादान देने का प्रकरण भी है, जो कि अन्य जीवनियों में नहीं है -

#दयानन्द_की_अद्भुत_क्षमाः- 
पवित्र परमहंस जी ने अपने तन-पिंजर को जर्जरीभूत करने वाले और प्राण पखेरुओं के वधिक जगन्नाथ को पकड़ लिया। जगन्नाथ ने अपने अधमतम अपराध को मान भी लिया। परन्तु कर्म-गति और फलभोग के विश्वासी महर्षि ने ताड़ना-तर्जना तो कहाँ, उसे तू तक नहीं कहा! वे गम्भीर भाव से दया दर्शाते बोले - "जगन्नाथ, मेरे इस समय मरने से मेरा कार्य सर्वथा अधूरा रह गया। आप नहीं जानते कि इससे लोक हित की कितनी भारी हानि हुई है। अच्छा, विधाता के विधान में ऐसा ही होना था। इसमें आपका भी क्या दोष है। जगन्नाथ, लो ये कुछ रुपये हैं, मैं आपको देता हूँ। आपके काम आएंगे। परन्तु जैसे भी हो राठौर-राज्य की सीमा से पार हो जाओ। नेपाल राज्य में जा छिपने से ही आपके प्राणों का परित्राण हो सकता है। यदि यहाँ के नरेश को घुणाक्षर न्याय से भी इस बात का पता लग गया, तो वह आपका बिन्दु विसर्ग तक विनष्ट करके ही विश्राम लेंगे। उनके प्रकोप के उत्ताप से आपका परित्राण कोई भी न कर सकेगा। जगन्नाथ, अब देर न करो। जाओ, चुपचाप भाग जाओ। मेरी ओर से सर्वथा निश्चिन्त रहना। इस हृदय सागर से आपका, यह भेद किसी प्रकार कभी भी प्रकाशित न होगा। जगन्नाथ ऋषि की आज्ञानुसार वहां से चला गया।

बहुत से लेखक इस प्रकरण को प्रामाणिक नहीं मानते, परंतु सत्यानंद जी ने इसकी सत्यता के लिए निम्न प्रमाण दिए -
महाराज के चरण-चिह्नों का अवलोकन करते, उनकी परम पावन पदपंक्तियों की यात्रा के भाव से गङ्गा-कूल पर फिरते समय, हमने भी यह सुना था कि राजघाट में संवत् १९७० तक एक जगन्नाथ नामक ब्राह्मण, प्रायः आकर वास किया करता था। वह साधुओं के वेश में रहता था। पगला सा प्रतीत होता था। वह जोधपुर में महाराज दयानन्द के सङ्ग था। कुछ एक साधु जनों में यह भेद खुल भी गया था कि उसकी उन्मत्तता कृत्रिम थी। वास्तव में वह ब्रह्मघातक था।

यह घटना यदि प्रामाणिक नहीं भी मानी जाती, तो भी ऋषि दयानंद की अपूर्व क्षमाशीलता के प्रसंगों कि कोई न्यूनता नहीं होगी, क्योंकि इससे पूर्व अनेकों बार उन्होंने विषदाताओं को क्षमा किया था और किसी को उसके विषय में बताया भी नहीं था। आगे का घटनाक्रम श्री लक्ष्मण जी बताते हैं -

#आर्य_पुरुषों_को_सूचना_तक_न_दी_गई:- आर्य पुरुषों को महर्षि की इस अवस्था की जानकारी देने का कतई प्रबंधन न किया गया। विष दिये जाने के तेरह दिन पश्चात् आर्य समाज अजमेर के एक सभासद् ने पत्रिका में रुग्णता का समाचार पढ़कर सबको सूचना दी, परन्तु पुराने अनुभव के आधार पर वे (आर्य लोग) यही समझे कि विरोधियों ने यह समाचार उड़ा दिया होगा। यदि सचमुच ऐसा होता, तो उस समय तारों (चिट्ठियों) की भरमार हो जाती, फिर भी उचित जानकर एक सभासद् स्वामी जी के पास भेजा गया। वह श्री महाराज को देखते ही दंग रह गया। उसने कहा, " भगवन्! यह क्या हुआ? तथा अधिक शोक तो इस बात पर है कि हमें सूचना तक भी नहीं दी गई।"

#यह_तो_शरीर_का_धर्म_हैः- स्वामी जी ने कहा, “रोग का क्या लिखते? यह तो शरीर का धर्म ही है। इसके अतिरिक्त तुम लोगों को क्लेश होता।” इस प्रकार इस सभासद् के कारण अजमेर तथा वहाँ से सारे देश में समाचार प्रसारित हुआ। तार पर तार आने लगे। अनेक भक्तजन स्वामीजी की रुग्णावस्था का समाचार पाकर, अपने सभी काम-धन्धे छोड़कर जोधपुर के लिए दौड़ पड़े। वहाँ पहुँच स्वामीजी की दशा देख वे चकित रह गये। रोग की दशा, इलाज की शिथिलता और सेवा की असुविधा देखकर आर्यपुरुषों ने ऋषि से आबू पर्वत पर चलने का आग्रह किया। स्वामीजी ने भी ऐसा ही कहा, परन्तु इसमें महाराजा ने अपनी अपकीर्ति जानी, परन्तु स्वामी जी ने जाने का विचार बना लिया।

इसी बीच महाराजा ने डॉ. ऐडम सिविल सर्जन को भी इलाज के लिये बुलवाया। उनका मत भी ऋषि को आबू ले जाने का था। यह खेद की बात है कि दो सप्ताह पर्यन्त रोग को दिन प्रतिदिन बढ़ते और जटिल होते देखकर भी इलाज न बदला गया। फिर सिविल सर्जन के साथ भी उसी डॉक्ट अलीमर्दान खाँ को भी साथ जोड़े रखा। बात केवल इतनी थी कि हितैषी लोग लज्जा के मारे बाहर बात नहीं कर सकते थे। जो देखभाल (आतिथ्य) करने वाले थे, वे रोगी की मृत्यु ही ईश्वर से चाहते थे।

#ऋषि_का_आबू_प्रस्थानः- अन्त को आबू जाने की तैयारी हुई। महाराजा ने बहुत शोक प्रकट किया तथा लज्जा भी अनुभव की, परन्तु अब रोकना ठीक नहीं था, अत: ढाई सहस्र रुपये तथा दो शाल भेंट किये गये। बहुत मान आदर के साथ स्वामी जी को विदा किया गया तथा मार्ग में सुविधापूर्वक यात्रा के लिये सब सामग्री दी गई, जिससे स्वामी जी आबू पहुँच गये। मार्ग में अजमेर के एक नामी हकीम पीर जी से जो औषधि मँगवाई गई, उससे प्यास आदि कुछ शान्त हुई। २१ अक्तूबर को प्रात:काल स्वामीजी महाराज आबूरोड पहुँचे। यहाँ कुछ समय विश्राम के अनन्तर उन्हें पुन: पालकी में लिटा दिया गया। जिस समय महाराज की पालकी आबूरोड से आबू पर्वत की ओर जा रही थी, उस समय राजकीय अस्पताल के चिकित्सा डॉ० लक्ष्मणदास स्थानान्तरित होकर आबू से अजमेर जा रहे थे। काषाय वेशधारी संन्यासी को पालकी में लेटे देखकर उन्होंने पूछताछ की तो पता लगा कि संन्यासी, प्रसिद्ध स्वामी दयानन्द सरस्वती हैं। वे भयंकर रोग से ग्रस्त होने के कारण आबू जा रहे हैं। उस समय स्वामीजी संज्ञा-रहित अवस्था में थे। डॉ० महाशय ने नाड़ी देखकर अमोनिया की थोड़ी-थोड़ी मात्रा तीन बार महाराज को दी। इस औषध से महाराज ने आँखें खोल दीं और कहा - "किसी ने मुझे अमृत दिया है।" डॉक्टर लक्ष्मण दास ने उसी समय निश्चय कर लिया कि उनकी नौकरी रहे या जाए, वह महाराज के साथ आबू जाकर उनकी सेवा और चिकित्सा करेगा और महाराज के साथ ही लौट पड़ा।

इनके दो दिन के उपचार से हिचकी बन्द हो गई तथा अतिसार भी बन्द हो गया, परन्तु डॉ० लक्ष्मण दास को उनके अधिकारी ने बड़ी कठोर आज्ञा देकर अजमेर जाने का आदेश दिया। उन्होंने बहुत अनुनय विनय की। त्यागपत्र तक दे दिया, परन्तु श्री स्वामी जी महाराज ने ही वह त्याग पत्र लेकर फाड़ दिया और उन्हें अजमेर जाने को कहा। देव दयानन्द ! धन्य है, आपका परहित चिंतन ! डॉ० लक्षमण दास विवश थे। क्या करते? आपने दूसरी बार फिर त्यागपत्र दिया, परन्तु डॉ० स्पैन्सर ने अस्वीकार करते हुए कहा कि - "तुम्हें अजमेर जाना पड़ेगा। मैं तुम्हारे गुरु की चिकित्सा स्वयं करूँगा।" दो तीन दिन के लिये औषधि और खानपान के बारे में डॉ० लक्ष्मण दास जी ने लिखकर दिया और फिर अजमेर चले गये।

#स्वामी_जी_का_अजमेर_प्रस्थानः- कर्नल स्पैंसर की चिकित्सा महाराज को अनुकूल न पड़ी। पुनः रोग ने उग्र रूप धारण कर लिया। स्वामी जी महाराज के भक्त भूपालसिंह ने महाराज से अजमेर चलने के लिए निवेदन किया। महाराज की इच्छा न थी कि शरीर की इस विषम अवस्था में भक्तजनों को कष्ट दिया जाए। न चाहते हुए भी भक्तजनों का अनुरोध स्वीकार करना पड़ा। कार्तिक कृष्ण एकादशी (२६ अक्टूबर १८८३) के दिन महाराज ने आबू पर्वत से प्रस्थान किया। अगले दिन चार बजे ब्राह्ममुहूर्त के समय आप अजमेर पहुँच गये। उस दिन बहुत लोग दर्शनार्थ स्टेशन पर पहुँचे तथा उनकी अवस्था को देखकर घबरा गये। चार व्यक्तियों ने बड़ी सावधानी से आपको गाड़ी से उतारा। गाड़ी से उतरते ही मूर्छा आ गई। उन्हें पुनः पालकी में लिटाया गया। धीरे-धीरे पालकी कोठी पर ले आये। पुनः डॉ० लक्षमणदास को बुलाकर उनकी चिकित्सा आरम्भ की गई। परन्तु खेद है कि अब कोई भी औषधि कुछ भी प्रभाव नहीं कर पाई। कष्ट दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। हाथ पांवों प्रत्युत सारे शरीर के ऊपर छाले पड़ गये थे। सब छालों को गर्म कपड़े से सेक किया जाता था। कहीं से पस और कहीं से रक्त निकलता था। गले से लेकर नाभि तक छाले पड़ गये थे। एक आर्य ने गला बैठ जाने का कारण पूछा, तो आपने मुख को खोलकर दिखाया तथा धीरे से बोले कि नाभि तक छाले पड़ गये हैं। श्वास बहुत शीघ्र आता था। स्वामी जी श्वास रोक रोककर फिर जल्दी ज़ोर से श्वास निकाल देते थे तथा कुछ ईश्वर का ध्यान भी करते थे। संयम तो अद्भुत था। कष्ट का संकेत तक नहीं करते थे। बैठकर निरन्तर टकोर करवाते, हाँ कभी इतना पूछते थे - “जो कुछ करना था, हो चुका कि नहीं?"

दीपमाला के दो दिन पूर्व लाहौर से पं० गुरुदत्त एम० ए० तथा लाला जीवनदास जी भी महाराज के दर्शनों के निमित्त अजमेर पहुँच गये।

#दिव्य_प्रयाण_की_तैयारी, #ऋषिवर_का_अंतिम_दिवसः- कार्तिक अमावास्या (३० अक्टूबर) के दिन डॉ० लक्ष्मण दास ने महाराज के जीवन की सब आशाएँ छोड़ दीं। भक्तजनों से अनुरोध किया कि किसी अन्य सुयोग्य डॉक्टर को भी महाराज को दिखाने लिए बुलाया जाए। अजमेर के सिविल सर्जन डॉ० न्यूमैन को बुलाया गया। आप देखते ही बोले कि यह व्यक्ति बहुत विशालकाय, साहसी तथा रोग को सहने वाला है। इतना असह्य रोग तथा यह अपने आपको दु:खी नहीं मानता है, स्वयं को सम्भाले हुये और अभी तक जीवित है। डॉ० लक्ष्मण दास ने स्वामी जी का नाम बताया, तो डॉ० न्यूटन का शोक और भी बढ़ गया। जो कुछ उनकी समझ में आया उन्होंने उपचार किया। एक मुसलमान वैद्य पीरजी बड़े प्रसिद्ध थे। वे भी उन्हें देखने आये। उन्होंने आते ही कह दिया - "इन्हें किसी कुल-कण्टक ने विष देकर अपनी आत्मा को कालिख लगाई है। इनकी देह पर सारे चिह्न विष-प्रयोग-जन्य ही दिखाई देते हैं।" पीरजी ने भी महाराज का सहन-सामर्थ्य देख दाँतों में अंगुली दबाते हुए कहा - “धैर्य का ऐसा धनी धरती-तल पर हमने दूसरा नहीं देखा।”

#ईश्वरेच्छा_मेंः- नश्वर देह को कब तक बचाया जा सकता था। जब भी अत्यधिक कष्ट हुआ, तो स्वामी जी से उनका वृत्त पूछा गया, तब उन्होंने अच्छा ही कहा, परन्तु आज ग्यारह बजे तो आपका कण्ठ भी खुल गया। यह अन्तिम दिवस के लिए ईश्वर ने सम्भाला था, परन्तु समझा गया स्वास्थ्य में सुधार। स्वामी जी ने स्वयं कहा कि आज जैसा आपका जी चाहे, भोजन बनाओ। भिन्न-भिन्न प्रकार का भोजन पकाकर सामने मेज पर रखा गया, जिसे देखकर श्री स्वामी जी ने कहा, "बस ले जाओ।" केवल एक चम्मच चने का पानी ही लिया। लाला जीवनदास जी लाहौर से आये थे। आपने पूछा, "महाराज! कहिये प्रकृति कैसी है? "कहा, "अच्छी है, आज एक मास के पश्चात् आराम का दिन है।"

एक बार विचार आया कि स्वामी जी होश में नहीं है। परीक्षा के लिये पूछा, "स्वामी जी! आप इस समय कहांँ है?" उत्तर दिया, "ईश्वरेच्छा में।" प्रभु के प्यारे उस योगेश्वर मृत्युञ्जय महर्षि का वास्तविक चित्र तो यही है।

पीड़ा को सहन करने में ऐसी सिद्धि थी, कि माथे पर जो छाला था, उसे आपने हाथ से रगड़ डाला। नापित को कहकर बुलवाया, तो वह मुखड़े पर उस्तरा नहीं फेरता था। उसे फोड़ों से रक्त बहने के विचार से ऐसा करने से संकोच हो रहा था। ऋषिवर ने कहा, "कोई चिन्ता मत करो, सब पर उस्तरा फेर दो।" ऐसा ही किया गया। इसके पश्चात् आपने वस्त्र से सिर को पोछा, कारण कि स्नान से सबने रोक दिया था।

#नश्वर_देह_का_क्या_अच्छा_होगाः- चार बजे के समय महाराज ने अपने शिष्य स्वामी आत्मानन्द को बुलाया। उसे अपने पीछे सिर के पास बैठने का आदेश दिया। उससे पूछा - "आत्मानन्द! तुम क्या चाहते हो?" आत्मानन्द ने कहा - " महाराज! मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि आप ठीक हो जाएँ।" महाराज ने उसे सान्त्वना देते हुए कहा - "यह देह पञ्चभौतिक है। इसका अच्छा क्या होगा?" पुनः उसके सिर पर आशीर्वाद का हाथ रखकर कहा - "आनन्द से रहना। महाराज के दर्शनार्थ काशी से स्वामी गोपालगिरि भी आये हुए थे। उन्हें भी इसी प्रकार आशीर्वाद दिया।

यह अवस्था देखकर सब स्थानों से आये हुए आर्य पुरुष स्वामी जी के सामने आकर खड़े हो गये। स्वामी जी ने ऐसी कृपा दृष्टि से सबकी ओर देखा कि लेखनी और वाणी से इसका वर्णन करना कठिन है। वह दृष्टि मानो कि अपनी मूकवाणी से आर्यों को यह कह रही थी कि तुम क्यों उदास हो। धीरज धरना चाहिये।

#सूर्य_अस्ताचल_की_ओर, #दिव्यात्मा_की_विदाई_का_समयः- इसके पश्चात् दो सौ रुपये तथा दो दुशाले आत्मानंद जी तथा पं० भीमसेन जी को दिये, परन्तु उन्होंने लौटा दिये। उस समय पाँच बज गये थे। महाराज से चित्त के बारे पूछा गया तो कहने लगे, “अच्छा है। तेज तथा अंधकार का भाव है।”

महाराज ने सब समागत भक्तजनों को आदेश दिया कि वे उनके पीछे खड़े हो जाएँ। दरवाजे और रोशनदान खुलवा दिया। आपने पूछा, "कौन सा पक्ष, क्या तिथि तथा क्या वार है? किसी भक्त ने कहा, "कृष्ण पक्ष का अंत है तथा शुक्ल पक्ष की आदि, अमावस, मंगलवार है।" तब आपने ऊपर की ओर दृष्टिपात किया, पुनः चारों ओर चमत्कार भरी दृष्टि डाली, फिर वेद मंत्रों का उच्चारण किया। तत्पश्चात् संस्कृत में ईश्वरोपासना की, फिर भाषा में ईश्वर का गुण कीर्तन किया। फिर बड़ी प्रसन्नता और हर्षपूर्वक गायत्री मन्त्र का पाठ किया। फिर हर्षित और प्रफुल्लित चित्त से कुछ समय के लिये समाधिस्थ रहकर नेत्र खोले और कहा, "दयामय, हे सर्वशक्तिमान् ईश्वर! तेरी यही इच्छा है। तेरी यही इच्छा है। तेरी इच्छा पूर्ण हो। आहा! तूने अच्छी लीला की।" वहीं करवट बदली तथा श्वासों को रोक कर एकदम बाहर निकाल दिया। आर्य भारत के भाग्य का भानु, देव दयानन्द, कार्तिक अमावस्या सम्वत् १९४० वैक्रमी, मंगलवार को सायं के छः बजे एकाएक, काल कराल रूप अस्ताचल की ओट में हो गया। उस समय सूर्यदेव भी अस्त हो गये थे। इस प्रकार दयानन्द सरस्वती इहलीला समाप्त कर ज्योतिर्मय की शरण में चले गए।

#पं०_गुरुदत्त_को_मिला_प्रत्यक्ष_प्रमाणः- भक्तजन निहारते रह गये। पं० गुरुदत्त विद्यार्थी प्रथम बार दयानन्द सरस्वती के दर्शन करने आये थे। वे पाश्चात्य विज्ञान के विद्यार्थी थे। ईश्वर का विश्वास कुछ कम था। भक्त-जनों के साथ योगी की देह-विसर्जन लीला उस कमरे के एक कोने में दीवार के साथ खड़े हुए चुपचाप देख रहे थे। वे विचार कर रहे थे कि असह्य वेदना और अन्तर्दाह में भी यह योगी किस प्रकार आनन्दमग्न है! यह सहनशीलता शरीर की सर्वथा नहीं है, अवश्य ही यह इनका आत्मिक बल है। विचार किया कि कोई दिव्य शक्ति इनका आह्वान कर रही है। यह उसकी शरण में प्रसन्नचित्त जा रहे हैं। यह योगी सदा के लिए अमरपद प्राप्त कर रहा है। गुरुदत्त को भी उस दिव्य शक्ति के दर्शन हो गये। अन्धकार नष्ट हुआ। दिव्य ज्योति का अन्त:प्रवेश हो गया। आज से वह पूर्ण आस्तिक हो गया। इस प्रकार ऋषिवर जाते-जाते भी गुरुदत्त जैसे नास्तिक का हृदय परिवर्तन कर गए। धन्य हे ऋषिवर!

सभी समुपस्थित भक्तजनों के नेत्र, इस योगी की वेदनामय विदाई में अश्रुपूर्ण थे, परन्तु इस विदाई के दिव्यतापूर्ण दृश्य को देखकर वे अपने हृदयों में अद्भुत ज्योति के प्रवेश का गौरव अनुभव कर रहे थे। यद्यपि उनके मृण्मय घरों में आज अन्धकार था, परन्तु हृदयों में आत्मिक दीपावली का अमिट प्रकाश था।

#ऋषि_की_देह_का_अंतिम_संस्कारः- अगले दिन इस योगी के शरीर की अन्त्येष्टि क्रिया की तैयारी हुई। काष्ठमय अर्थी को केले के पुष्पों और पत्तों से सजाया गया। शरीर पर चन्दन का लेप किया गया। अर्थी पर रखकर एक विशाल शोभा यात्रा में अजमेर की जनता के साथ, वहाँ रहने वाले बंगाली, पंजाबी, दाक्षिणात्य तथा अन्य भक्त पुरुष बड़ी संख्या में सम्मिलित हुए। श्री हरविलास शारदा भी अर्थी के साथ थे।

श्मशान घाट पर अन्त्येष्टि क्रिया के निमित्त विशेषरूप से वेदी का निर्माण किया गया। वेदी बन जाने पर भक्त लोगों ने दो मन चन्दन और दस मन पीपल की समिधाओं से चिता चयन की। अपने टूक-टूक होते हृदयों को थामकर उन्होंने गुरुदेव का शव उस अन्तिम शय्या पर शायी कर दिया। रामानन्द और आत्मानन्दजी ने यथाविधि अग्न्याधान किया। अग्नि-स्पर्श होते ही घृतसिंचित चिता ज्वाला-माल से आवृत हो गई। उस दाह-कुण्ड में चार मन घी, पाँच सेर कपूर, एक सेर केसर और दो तोले कस्तूरी डाली गई। चरु और घृत की पुष्कल आहुतियों से हुत श्री महाराज का शव, प्रेमियों के नीर-नेत्रों से देखते ही देखते अपने कारणों में लय हो गया।

(देवेंद्रनाथ कृत जीवनी के अनुसार शवदाह में जो सब सामग्री लगी, उसका कुल मूल्य ₹२०० के लगभग था। आज के मूल्य वृद्धि के हिसाब से यह रुपए बहुत अधिक नहीं बैठेंगे। जो अज्ञलोग आज यह आक्षेप कर रहे हैं कि उनके दाह संस्कार में लाखों रुपए लगा दिए गए, किस आधार और गणना के हिसाब से यह कह रहे हैं, यह तो वही बताएंगे। अस्तु, मूर्ख लोगों का कुछ नहीं किया जा सकता। इन्हें ईश्वर की दया पर छोड़ देना चाहिए।)

ऋषि की अस्थियों को चयन करके, शहापुराधीश के दिये उद्यान में गाड़ दिया गया। वह उद्यान अनासागर के किनारे पुष्कर की सड़क पर है। ऋषिवर की जीवनी लिखने वालों में एक श्री हरविलासजी शारदा भी थे, जिन्होंने जीवनी लिखने हेतु कई वर्षों तक अनुसंधान किया। उन्होंने अन्तिम दृश्य का वर्णन इन शब्दों में किया है - (स्वामीजी के देहत्याग के पश्चात्) हम तीनों (शारदाजी तथा उनके पुत्र रामगोपाल और चचेरा भाई रामविलास) रोते हुए लौटे। दीपावली के पुण्य अवसर पर हमें रोता देखकर पिताजी को आश्चर्य हुआ। उन्होंने रोने का कारण पूछा। मैंने सुबकियाँ भरते हुए कहा - "भारत का सूर्य छिप गया है।" मेरे पिताजी को समझते देर नहीं लगी। उन्होंने हमें दिलासा दिया।

दूसरे दिन स्वामीजी का शव जलाया गया। प्रात: ९ बजे और १० बजे के मध्य उनके मृत-देह को विमान-जुलूस के रूप में श्मशान-भूमि में ले जाया गया। मैं प्रारम्भ से ही जुलूस के साथ था। अन्य आर्य भाइयों के साथ, अरथी को कन्धा लगाने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह अरथी बहुत बड़ी थी और १६ व्यक्ति उसे उठाये हुए थे। एक बार अजमेर नगर में एक व्याख्यान में उन्होंने बाल-विवाह की कुप्रथा का प्रबल खण्डन और ब्रह्मचर्य का मण्डन किया था। उन्होंने कहा था कि जो ब्रह्मचर्य धारण नहीं करते और बाल-विवाह के शिकार होते हैं, वे दुर्बलकाय होते हैं । अपने सम्बन्ध में बोलते हुए उन्होंने कहा था कि - "मैंने अपने जीवन में पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया है और मेरे शव को उठाने में १६ आदमी लगेंगे।" मुझे यह बात सहसा याद आ गई।

महर्षि दयानन्द की इहलोक-लीला समाप्त हुई, किन्तु उनका जीवन जीवित-प्रेरक आलोक बन आज भी हमारे सम्मुख विद्यमान है। ऋषि दयानन्द अमर हैं, अपने कीर्तिमय जीवन-सुमन में। संसार उनकी सुगन्धि से सदा सुवासित रहेगा।

🙏#प्रस्तुति - आर्य विजय चौहान

।। #ओ३म्_शम् ।।

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