Thursday, April 2, 2026

क्षमा करना।

24.9.2021
        *"व्यक्ति दूसरे की गलतियों को तो माफ नहीं करता, स्वयं गलती करके दूसरों से माफी चाहता है। यह तो असंभव, अतिस्वार्थ और मूर्खता का लक्षण है।"*
         बहुत से लोग स्वयं को बहुत चतुर मानते हैं, जबकि उनमें चतुराई नहीं, बल्कि मूर्खता होती है।  कुछ लोग ऐसा व्यवहार करते हैं, कि *"जब कोई दूसरा उनके साथ गलती कर बैठे, और वह उनसे माफी मांगे, तो वे माफ नहीं करते। परंतु जब ऐसे स्वार्थी लोग दूसरों के प्रति कोई गलती करते हैं, तब वे चाहते हैं, कि दूसरा व्यक्ति उन्हें माफ कर दे।" "कितनी मूर्खता दुष्टता और धृष्टता की सोच है यह। ऐसा सोचना और व्यवहार करना अत्यंत अनुचित है।"* इसलिए ऐसे लोग कभी न तो अपना कल्याण कर सकते, और न ही दूसरों का।
        बुद्धिमत्ता इसका नाम है, कि *"आप पूरी सावधानी से दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करें।  कहीं भी गलती ना होने दें।"* फिर भी मनुष्य अल्पज्ञ है, अल्पशक्तिमान है, कहीं न कहीं उससे भूल हो जाती है। *"इस प्रकार से मानव स्वभाव के कारण, या अल्पज्ञता के कारण, अल्पशक्तिमत्ता के कारण, यदि कभी आपसे भूल हो भी जाए। तो जैसे आप दूसरों से अपनी भूल की माफी चाहते हैं, वैसे ही जब कभी आपके साथ कोई दूसरा व्यक्ति गलती कर दे, और वह आपसे माफी मांगे, तो आपको भी उसे माफ़ कर देना चाहिए। यही व्यवहार शुद्ध है।"*
        यद्यपि सच तो यही है, कि *"कोई किसी को माफ नहीं करता।" फिर भी लोक व्यवहार निभाने के लिए एक औपचारिकता जरूर  निभाई जाती है, कि "मुझसे गलती हो गई, कृपया आप मेरी गलती को माफ कर दें।"*
      प्रश्न -- माफ करने का सही अर्थ क्या है?
उत्तर -- माफ करने का सही अर्थ है, कि *"यदि किसी दूसरे व्यक्ति ने आपके साथ कुछ गलत व्यवहार कर दिया, उससे आपकी कुछ न कुछ हानि हुई। उस हानि से आपको कष्ट हुआ। आपने अपमान का अनुभव किया। तो आपके मन में जो उसके प्रति क्रोध उत्पन्न होगा, यदि आप उसे बिल्कुल हटा दें, और उस व्यक्ति को पहले जैसा शुद्ध व्यक्ति मान लें, जैसा गलती करने से पहले आप उसे मानते थे। इसका नाम माफ कर देना है।"* ऐसा तो कोई भी नहीं करता। न कोई कर सकता। क्योंकि यह बात न्याय नियम के विरुद्ध है। मनोविज्ञान के विरुद्ध है। आप न्याय और मनोविज्ञान के विरुद्ध कार्य नहीं कर सकते। इसलिए आप उसे माफ़ नहीं करते। अर्थात *"आपके मन के एक कोने में कहीं न कहीं उसके प्रति एक गांठ बन जाती है, कि - "इसने मेरी हानि की है। मुझे दुख दिया है, यह दुष्ट व्यक्ति है। या तो मैं इसे दंडित करूंगा। और यदि दंड नहीं दे पाया, तो कम से कम इसको दुष्ट तो अवश्य ही मानूंगा। भविष्य में इससे सावधान भी जरूर रहूंगा।"* यह विचार तो आपके मन में अवश्य रहेगा ही। इसे कोई भी नहीं निकाल सकता। जब आप उसे इस रूप में माफ़ नहीं कर पाए, तो सोच लीजिए। जब आप भी दूसरों के साथ गलतियां करेंगे, तब दूसरे लोग भी आप को माफ नहीं करेंगे। वे लोग भी आपको पूर्ववत् शुद्ध व्यक्ति नहीं मानेंगे। क्योंकि ऐसा मानना असंभव है।
        *"इसलिए बुद्धिमत्ता इसी में है, कि दूसरों को दुख न देवें। दूसरों पर अत्याचार न करें। सबके साथ पूरी सावधानी से और न्यायपूर्वक उत्तम व्यवहार करें। फिर भी यदि गलती हो जाए, तो कम से कम माफी मांगने की औपचारिकता तो अवश्य निभाएं। इससे उसका गुस्सा पूरी तरह तो नहीं निकलेगा, परन्तु कुछ कम अवश्य हो जाएगा, जिससे आगे व्यवहार चलाने में थोड़ी सुविधा होगी।"*
---- *स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, रोजड़, गुजरात।*

Saturday, November 29, 2025

पिप्पलाद ऋषि और शनि देव।

श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।

जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।

  एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-

नारद- बालक तुम कौन हो ?
बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।
नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?
बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।

   तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।

बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?
नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।
बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?
नारद- शनिदेव की महादशा।

  इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।
नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।ब्रह्मा जी से वर्य मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर्य मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-

1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा।जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।

2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।
 
  ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे।अतः तभी से शनि "शनै:चरति य: शनैश्चर:" अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।
       सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है।आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की,जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है ।