Saturday, May 11, 2019

प्रसिद्ध मूत्र।

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*प्रसिद्ध मूत्र व गुर्दा रोग विशेषज्ञ डॉ निशान्त गुप्ता 'आयुष' द्वारा जानिये कठिन गुर्दा व मूत्र रोगों पर कुछ ऐसे तथ्य-रहस्य जिनके कारण आज तक आयुर्वेद में ही है कठिन मूत्र-गुर्दा रोगों की चिकित्सा सम्भव लेकिन इस लेख में बताये जा रहे सूक्ष्म स्तर का व्यवहारिक ज्ञान अब कुछ ही आयुर्वेदिक चिकित्सकों के पास उपलब्ध है❗❗*

➡ *गुर्दा रोग मुख्यतः शरीर की पाँच प्रकार की वायुओं में से समान, अपान व व्यान वायु के असंतुलन के कारण होता है जिन्हें मापकर संतुलित करने की कोई विधि आधुनिक चिकित्सा में आज तक है ही नहीँ,जबकि दक्ष आयुर्वेदिक चिकित्सक अष्ट-विधि परीक्षण द्वारा इस असंतुलन का सटीक आंकलन कर कठिनतम गुर्दा रोगियों को अधिकतम स्तर तक सुखमय जीवन देता है।*

➡ *गुर्दा रोगों में मुख्यतः पेशाब में अधिक प्रोटीन स्राव होकर(लालामेह)रक्त में यूरिया,क्रिएटिनिन नामक विषैले पदार्थ बढ़ने लगते हैं।हर शब्द को ध्यान से पढ़ते हुए समझें कि कौन सी वायु कैसे असंतुलित होकर मूत्र व गुर्दा रोगों को जन्म देती है व उच्च रक्तचाप,उल्टी आदि जैसे लक्षण पैदा करती है।*

1⃣ *समान वायु - आमाशय व पक्वाशय में निवास कर भोजन के पचने से पैदा हुए रसों को अलग-अलग करती है व इसके असंतुलन से ये रस विषाक्त होकर पृथक नहीँ होते व साधारण मात्रा से अधिक यूरिया-क्रिएटिनिन के रूप में रक्त में ही रहने लगते हैं।*

2⃣ *व्यान वायु -इन पृथक किये गए रसों आदि से पूरे शरीर में पहुँचकर अँगों का पोषण करती है और फैलाने,सिकोड़ने,प्रेशर बनाने जैसी क्रियाएँ शरीर के सभी अंगों से कराती है।यह शरीर के हर अंग में लेकिन मुख्यतः हृदय में निवास करती है इसलिये इसके  असंतुलन से रक्त चाप भी बढा हुआ रहने लगता है व इसी के असंतुलन से गुर्दे की अति सूक्ष्म शिराएँ(नेफ्रॉन) व रक्तचाप संतुलित करने वाला अंतः स्रावी(हॉर्मोन) - इराइथ्रोपोएटिन थिथिल पड़ जाता है जिसके कारण⬇⬇⬇⬇*

3⃣ *अपान वायु जो बड़ी आँत में गुदा,पक्वाशय,अंडकोष,मूत्रेन्द्रिय,नाभि एवं बस्ति प्रदेश में निवास करती है असंतुलित होकर बढ़े हुए यूरिया व क्रिएटिनिन को मल-मूत्र द्वारा बाहर नहीँ फेंक पाती।यही अपान वायु असंतुलित होने पर पित्त रूपी यूरिया व क्रिएटिनिन मल को उदर क्षेत्र से ऊपर पहुँचकर उसे वमन(उल्टी)द्वारा बाहर करने की कोशिश करती है,जिस कारण गुर्दा रोगी को उल्टियाँ होना प्रमुख लक्षण है।*

♦ *इन तीन वायुओं के असंतुलन से उपापचय क्रिया बाधित होकर गुर्दा व कठिन मूत्र रोगों को जन्म देती है तो  एलोपैथी चिकित्सा चूँकि इन सिद्धांतों को आज तक समझ नहीँ पायी इसलिये वह  सम्बंधित बिगड़ी हुई क्रियाओं को भारी 'साइड इफ़ेक्ट' वाली एस्टेरोइड,डाइयूरेटिक्स(पेशाब बढाने के लिए) एंटी-हाइपरटेन्सिव्स(हाई बीपी के लिए),एंटी-एमेटिक्स(उल्टी के लिए)जैसी दवाओं से लगभग तीन घण्टों के लिए(प्रति खुराक)संगठित करने की कोशिश करती है व कुछ दिन बाद इनके भी फेल होने पर लगभग प्रतिदिन डायलिसिस(खर्चीला व बहुत कष्टदायक) द्वारा रक्त साफ़ करना एकमात्र विकल्प रह जाता है - पर गुर्दा इससे भी ठीक नहीँ हो सकता बल्कि धीरे-धीरे अपना बाकी बचा कार्य भी भूल जाता है जबकि एक दक्ष आयुर्वेदिक चिकित्सक इन सूक्ष्म सिद्धांतों पर क्रमबद्ध कार्य करके रोगी की अवस्थानुसार विभिन्न औषधियों व परहेज आदि का चयन कर ऐसे रोगियों को नया जीवन प्रदान करता है।*

*ईश्वर आपको स्वस्थ जीवन दे*
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*डा. निशान्त गुप्ता आयुष, बी.फ़ार्म,एम.आयु,एन.डी, पी.एच.डी(आयु),एम.डी - (पंचगव्य)*
*मूत्र व गुर्दा रोग विशेश्ग्य,गांधी चौक,शामली*
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Wednesday, April 17, 2019

राजा विक्रमादित्य के नवरत्न।

राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों के विषय में बहुत कुछ पढ़ा-देखा जाता है। लेकिन बहुत ही कम लोग ये जानते हैं कि आखिर ये नवरत्न थे कौन-कौन।

राजा विक्रमादित्य के दरबार में मौजूद नवरत्नों में उच्च कोटि के कवि, विद्वान, गायक और गणित के प्रकांड पंडित शामिल थे, जिनकी योग्यता का डंका देश-विदेश में बजता था। चलिए जानते हैं कौन थे।

ये हैं नवरत्न –

1–धन्वन्तरि-
नवरत्नों में इनका स्थान गिनाया गया है। इनके रचित नौ ग्रंथ पाये जाते हैं। वे सभी आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र से सम्बन्धित हैं। चिकित्सा में ये बड़े सिद्धहस्त थे। आज भी किसी वैद्य की प्रशंसा करनी हो तो उसकी ‘धन्वन्तरि’ से उपमा दी जाती है।

2–क्षपणक-
जैसा कि इनके नाम से प्रतीत होता है, ये बौद्ध संन्यासी थे।
इससे एक बात यह भी सिद्ध होती है कि प्राचीन काल में मन्त्रित्व आजीविका का साधन नहीं था अपितु जनकल्याण की भावना से मन्त्रिपरिषद का गठन किया जाता था। यही कारण है कि संन्यासी भी मन्त्रिमण्डल के सदस्य होते थे।
इन्होंने कुछ ग्रंथ लिखे जिनमें ‘भिक्षाटन’ और ‘नानार्थकोश’ ही उपलब्ध बताये जाते हैं।

3–अमरसिंह-
ये प्रकाण्ड विद्वान थे। बोध-गया के वर्तमान बुद्ध-मन्दिर से प्राप्य एक शिलालेख के आधार पर इनको उस मन्दिर का निर्माता कहा जाता है। उनके अनेक ग्रन्थों में एक मात्र ‘अमरकोश’ ग्रन्थ ऐसा है कि उसके आधार पर उनका यश अखण्ड है। संस्कृतज्ञों में एक उक्ति चरितार्थ है जिसका अर्थ है ‘अष्टाध्यायी’ पण्डितों की माता है और ‘अमरकोश’ पण्डितों का पिता। अर्थात् यदि कोई इन दोनों ग्रंथों को पढ़ ले तो वह महान् पण्डित बन जाता है।

4–शंकु –
इनका पूरा नाम ‘शङ्कुक’ है। इनका एक ही काव्य-ग्रन्थ ‘भुवनाभ्युदयम्’ बहुत प्रसिद्ध रहा है। किन्तु आज वह भी पुरातत्व का विषय बना हुआ है। इनको संस्कृत का प्रकाण्ड विद्वान् माना गया है।

5–वेतालभट्ट –
विक्रम और वेताल की कहानी जगतप्रसिद्ध है। ‘वेताल पंचविंशति’ के रचयिता यही थे, किन्तु कहीं भी इनका नाम देखने सुनने को अब नहीं मिलता। ‘वेताल-पच्चीसी’ से ही यह सिद्ध होता है कि सम्राट विक्रम के वर्चस्व से वेतालभट्ट कितने प्रभावित थे। यही इनकी एक मात्र रचना उपलब्ध है।

6–घटखर्पर –
जो संस्कृत जानते हैं वे समझ सकते हैं कि ‘घटखर्पर’ किसी व्यक्ति का नाम नहीं हो सकता। इनका भी वास्तविक नाम यह नहीं है। मान्यता है कि इनकी प्रतिज्ञा थी कि जो कवि अनुप्रास और यमक में इनको पराजित कर देगा उनके यहां वे फूटे घड़े से पानी भरेंगे। बस तब से ही इनका नाम ‘घटखर्पर’ प्रसिद्ध हो गया और वास्तविक नाम लुप्त हो गया।

इनकी रचना का नाम भी ‘घटखर्पर काव्यम्’ ही है। यमक और अनुप्रास का वह अनुपमेय ग्रन्थ है।
इनका एक अन्य ग्रन्थ ‘नीतिसार’ के नाम से भी प्राप्त होता है।

7–कालिदास –
ऐसा माना जाता है कि कालिदास सम्राट विक्रमादित्य के प्राणप्रिय कवि थे। उन्होंने भी अपने ग्रन्थों में विक्रम के व्यक्तित्व का उज्जवल स्वरूप निरूपित किया है। कालिदास की कथा विचित्र है। कहा जाता है कि उनको देवी ‘काली’ की कृपा से विद्या प्राप्त हुई थी। इसीलिए इनका नाम ‘कालिदास’ पड़ गया। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से यह कालीदास होना चाहिए था किन्तु अपवाद रूप में कालिदास की प्रतिभा को देखकर इसमें उसी प्रकार परिवर्तन नहीं किया गया जिस प्रकार कि ‘विश्वामित्र’ को उसी रूप में रखा गया।

जो हो, कालिदास की विद्वता और काव्य प्रतिभा के विषय में अब दो मत नहीं है। वे न केवल अपने समय के अप्रितम साहित्यकार थे अपितु आज तक भी कोई उन जैसा अप्रितम साहित्यकार उत्पन्न नहीं हुआ है। उनके चार काव्य और तीन नाटक प्रसिद्ध हैं। शकुन्तला उनकी अन्यतम कृति मानी जाती है।

8–वराहमिहिर –
भारतीय ज्योतिष-शास्त्र इनसे गौरवास्पद हो गया है। इन्होंने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया है। इनमें-‘बृहज्जातक‘, सुर्यसिद्धांत, ‘बृहस्पति संहिता’, ‘पंचसिद्धान्ती’ मुख्य हैं। गणक तरंगिणी’, ‘लघु-जातक’, ‘समास संहिता’, ‘विवाह पटल’, ‘योग यात्रा’, आदि-आदि का भी इनके नाम से उल्लेख पाया जाता है।

9–वररुचि-
कालिदास की भांति ही वररुचि भी अन्यतम काव्यकर्ताओं में गिने जाते हैं। ‘सदुक्तिकर्णामृत’, ‘सुभाषितावलि’ तथा ‘शार्ङ्धर संहिता’, इनकी रचनाओं में गिनी जाती हैं।
इनके नाम पर मतभेद है। क्योंकि इस नाम के तीन व्यक्ति हुए हैं उनमें से-
1.पाणिनीय व्याकरण के वार्तिककार-वररुचि कात्यायन,
2.‘प्राकृत प्रकाश के प्रणेता-वररुचि
3.सूक्ति ग्रन्थों में प्राप्त कवि-वररुचि