Thursday, May 4, 2017

गर्मी में खाए सत्तू? और इन 7 फायदों पर करें गौर....


गर्मी में खानपान का खास ख्याल न सिर्फ आपके शरीर के लिए बेहतर है, बल्कि आपको डॉक्टर के पास जाने से बचा सकता है. सभी जानते हैं कि गर्मी में प्यास ज्यादा लगती है और इसके लिए हम पानी से लेकर जूस, शरबत आदि का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं. ऐसे में सत्तू आपके लिए एक विकल्प हो सकता है. काले चनों से बना सत्तू सबसे ज्यादा शरबत के तौर पर इस्तेमाल होता है. खासकर बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश में रहने वाले परिवार इसका खूब इस्तेमाल करते हैं. सत्तू को और प्रभावशाली बनाने के लिए इसमें ज्वार और बाजरे का आटा भी मिलाया जाता है.
सत्तू और भूनने का महत्व
सत्तू का आटा भूने हुए चने से तैयार किया जाता है. इसका सबसे बड़ा फायदा ये होता है कि इससे सत्तू का प्रोटीन खत्म नहीं होता. शरीर को पानी से भी ज्यादा ठंडक पहुंचाता है.फिटनेस फ्रिक सत्तू की बनी ड्रिंक पीना ना भूलें. यह शरीर को पानी से भी ज्यादा ठंडक पहुंचाता है. साथ ही प्रोटीन भी देता है. इसका फायदा सबसे ज्यादा वर्कआउट के बाद होता है.
सत्तू से बनने वाले व्यंजन सत्तू शरबत ही नहीं, बल्कि कई स्वादिष्ट व्यंजन बनाने में भी काम आता है. बिहार-पूर्वांचल में सबसे लज़ी़ज़ लिट्टी में भी सत्तू भरा जाता है. सत्तू के पराठे भी ठीक उसी तरह बनते हैं जैसे हम आलू के पराठे बनाते हैं. सत्तू भरी हुई पूड़ियां भी बनती हैं. सत्तू में पहले लहसून, प्याज, हींग, जीरे आदि को मिला दिया जाता है, फिर उसे पूड़ी में भर दिया जाता है. उसके बाद पूड़ी बना दी जाती है.
बच्चों के लिए कैसे फायदेमंद सत्तू बढ़ती उम्र के बच्चों के लिए काफी फायदेमंद है. अगर सत्तू के बने आटे का स्वाद दुगना करना हो तो गुड़ का इस्तेमाल करें. जैसा हम जानते है सत्तू से शरीर को प्रोटीन, विटामिन ए, कार्बोहाईड्रेट्स, मिनरल मिलता है, इसलिए आटे में भी थोड़ी मात्रा में सत्तू का उपयोग किया जा सकता हैं.
सत्तू डायबटीज़ के मरीज़ों के लिए लाभदायक क्योंकि सत्तू में अच्छी मात्रा में आयरन, मैगनीज़, मैग्नीशियम, कम ग्लाइसेमिक और सोडियम होता है, इसलिए जानकारों की माने तो डायबटीज के मरीजों के लिए ये फायदेमंद होता है.
जब नुकसान पहुंचा सकता है सत्तू रात में सत्तू से बने व्यंजन खाने से परहेज करना चाहिए. जब भी सत्तू का शरबत पिएं तो उसे पतला रखें, ताकि ये आसानी से पच जाए. खाली पेट सत्तू शरीर के लिए सबसे लाभदायक होता है. लोग सत्तू को दूध में मिलाके पीने से भी मना करते हैं.

वेद संसार के पुस्तकालय की सबसे पुरानी पुस्तकें हैं।


भारतीय व विदेशी विद्वान स्वीकार करते हैं कि वेद संसार के पुस्तकालय की सबसे पुरानी पुस्तकें हैं। वेद चार है, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। यह चारों वेद संस्कृत में हैं। महाभारत ग्रन्थ का यदि अध्ययन करें तो ज्ञात होता है कि महाभारत काल में भी वेद विद्यमान थे। महाभारत में योगेश्वर श्री कृष्ण और अनेक पात्रों द्वारा वेदों का आदर के साथ उल्लेख मिलता है। रामायण का अध्ययन करें तो वहां भी वेदों का वर्णन मिलता है। रामायण में ऋषि-मुनियों द्वारा यज्ञ करने का विवरण भी मिलता है जिनकी राक्षसों से रक्षा करने के लिए महर्षि विश्वामित्र राम वलक्ष्मरण को दशरथ से मांग कर अपने साथ अपने आश्रमों में ले गये थे। रावण के बारे में कहा जाता है कि वह चारों वेदों का विद्वान था। मर्यादा पुरूषोत्तम राम के श्वसुर महाराज जनक भी वेदों के विद्वान थे। प्राचीन उपनिषद ग्रन्थ में याज्ञवल्क्य का महाराज जनक से वार्तालाप प्राप्त होता है जिसमें वह वेदों की चर्चा करते हैं। रामायण व महाभारत काल में संसार में वेदों के अतिरिक्त दूसरा कोई ज्ञान का पुस्तक या धर्म ग्रन्थ होने का प्रमाण नहीं मिलता। इससे सिद्ध होता है कि वेद ज्ञान की पुस्तकें एवं संसार में सर्वप्राचीन हैं। अब यदि वेद सर्वप्राचीन हैं तो वेद किसकी रचना है अर्थात् वेदों का रचयिता कौन है? पहली सम्भावना तो यह कही जा सकती है कि यह ग्रन्थ किसी ऋषि ने या बहुत से ऋषियों ने मिलकर बनाया होगा। परन्तु वेदों की उत्पत्ति किसी ऋषि से नहीं हुई, यह वेदों की अन्तःसाक्षी से ज्ञात होता है।
रामायण तथा महाभारत के उदाहरणों से यह तो ज्ञात होता है कि इन दोनों कालों में न केवल हमारे देश का अपितु विश्व के धार्मिक, सामाजिक, व्यवहार तथा कर्तव्य-अकर्तव्य का एक ही ग्रन्थ था और वह था वेद क्योंकि वेदेतर किसी ग्रन्थ का उल्लेख, विचारधारा व सिद्धान्त इन सर्व प्राचीन ग्रन्थ वेदों में नहीं है। वेद के अतिरिक्त अन्य वैदिक साहित्य जिनमें मनुस्मृति, उपनिषद तथा दर्शन आदि ग्रन्थ आते हैं, इन सबमें भी वेदों का ही उल्लेख मिलता है अन्य किसी वेद तुल्य या वेदों से भिन्न ग्रन्थ का नहीं। अतः वेद एक मात्र प्राचीनतम् ग्रन्थ है, यह सिद्ध हो जाता है। अब यह देखना है कि वेदों की उत्पत्ति किस प्रकार से हुई? वेद का अर्थ ज्ञान होता है। वेद से ही विद्वान शब्द बिना है और विद्वान ज्ञानी को या जानने वालों को कहते हैं। वेद से ही विद्या शब्द बना है जिसका अर्थ भी ज्ञान या knowledge है। अब यदि हम यह जान लंे कि ज्ञान की उत्पत्ति कैसे होती है तो यह ज्ञात हो जायेगा कि वेद की उत्पत्ति कैसे व किससे हुई? ज्ञान का सम्बन्ध हमारी आत्मा व बुद्धि से है। आत्मा एक चेतन तत्व है। चेतन से भिन्न तत्व को हम जड़ तत्व, निर्जीव व अचेतन कहते हैं। जड़ तत्वों में कुछ नियम कार्य करते हैं परन्तु उन्हें उसका ज्ञान नहीं है। हम अर्थात् मनुष्यों को स्वयं का और जड़ तत्वों का भी ज्ञान है। उदाहरण के लिए जल को लेते हैं। हमें यह ज्ञान है कि जल द्रव है, ठोस या गैस नहीं है। जल परमाणुओं से मिलकर बना है। जल में हाईड्रोजन तथा आक्सीजन के परमाणु है। सूक्ष्म विज्ञान से ज्ञात होता है कि जल अणुओं का समूह है। अणु परमाणु का समूह होते हैं। हाईड्रोजन के दो परमाणु आक्सीजन के एक परमाणु से मिलकर जल का एक अणु तैयार करते है। जल बनाने का यह कार्य हम स्वयं हाईड्रोजन व आक्सीजन गैस को मिलाकर भी कर सकते हैं। यह ज्ञान हम मनुष्यों को तो होता है परन्तु जल या अन्य किसी अचेतन वा जड़ तत्व को नहीं होता। अब हमारे पास एक ही सम्भावना है कि यह वेद अर्थात् ज्ञान किसी चेतन तत्व के द्वारा निर्मित व उत्पन्न है।